प्लास्टिक गर्भवती महिलाओ के लिए अत्यंत घातक साबित होता है, गर्भवती के फेफड़ों में मौजूद प्लास्टिक के बारीक कण आसानी से शिशु के हृदय, मस्तिष्क, लिवर, किडनी सहित अन्य अंगों तक का सफर तय कर लेते हैं। माँ-शिशु को जोड़ने वाला गर्भनाल भी इन बारीक कणों का रास्ता रोकने में कुछ खास कारगर नहीं साबित होती। रटगर्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने चूहों पर अध्ययन के बाद यह दावा किया है। यह अध्ययन स्तनपायी जीवों में मां से गर्भस्थ शिशु में प्लास्टिक कण पहुंचने की तस्दीक करने वाला दुनिया का पहला अध्ययन है, जो किया गया है।

प्रोफेसर फोब स्टेपलटन के देखरेख में हुए इस अध्ययन में यह भी देखा गया कि प्लास्टिक कणों के संपर्क में आ जाने वाले चूहों के भ्रूण का विकास बेहद धीमी गति से होता है और शिशु तक पोषण पहुंचने में बाधा उत्पन्न होती है, इसका असर गर्भावस्था और जन्म के समय कम वजन के रूप में उभरकर सामने आता है। दिसंबर 2020 में प्रकाशित एक शोध में मानव गर्भनाल में प्लास्टिक के बारीक कणों की मौजूदगी दर्ज की गई थी। शिशु के जन्म के बाद दान किए गए गर्भनाल पर हुए अध्ययन में भी चौकाने वाले संकेत मिले थे कि पॉलिस्टरीन से बने मोती गर्भनाल की बाधा पार करने में सक्षम हैं।
प्रोफेसर स्टेपलटन की माने तो प्लास्टिक प्रदूषण पृथ्वी के कण-कण में समा गया है।
प्लास्टिक के कणों की मौजूदगी एवरेस्ट की चोटी से लेकर सबसे गहरे समुद्र तक में, दर्ज की गई है। खानपान और हवा से श्वास के जरिये लोगों के शरीर में प्लास्टिक पहुंचने की बात की कई अध्ययनों में पुष्टि की जा चुकी है। स्टेपलटन ने कहा कि मानव शरीर पर प्लास्टिक कणों के अधिक दुष्प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं हो सके हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक गर्भस्थ शिशु और बच्चों में उन हानिकारक रसायनों के ,जो शारीरिक-मानसिक विकास पर बुरा असर डालते हैं प्रवेश का बड़ा कारण बन सकता है। ऐसे में वैश्विक समुदाय को प्लास्टिक प्रदूषण जैसे बड़े खतरे से आने वाले समय में, निपटने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। जो पुरे विश्व के संपूर्ण मानवता के लिए अति आवश्यक है।

अध्ययन में यह बात सामने आयी कि 60 प्रतिशत कण गर्भनाल से भ्रूण में पहुंच रहे हैं द जर्नल पार्टिकल एंड फाइबर टॉक्सीलॉजी’ में छपे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गर्भवती चूहिया को अपने अध्ययन में शामिल किया और उसकी श्वास नली में पॉलीस्टिरीन मोती का बुरादा डाला। बुरादे को रेडियोधर्मी पदार्थ से रंग दिया गया था, ताकि पॉलीस्टिरीन शरीर में जहां जहां भी जाये, वो हिस्सा जगमगा उठे। इस दौरान चूहिया के शरीर में जो पदार्थ प्रवेश किया था उसमे से 60 फीसदी कण गर्भस्थ शिशु के शरीर में पहुंचने में कामयाब हो गए।उस गर्भस्थ चुहिया के प्लास्टिक के संपर्क में आने के मात्र 90 मिनट के भीतर इसके कण गर्भनाल पार करते देखे गए , जो अध्यनकर्ताओ को आश्चर्यचकित कर दिए।
गर्भस्थ शिशु के वजन में 07 प्रतिशत कमी आ गयी– अध्ययन में देखा गया कि प्लास्टिक कणों के संपर्क में आने के चौबीस घंटे के भीतर ही भ्रूण का वजन सामान्य गर्भस्थ शिशुओं के मुकाबले औसतन 07 फीसदी घट गया। वहीं, शिशु के गर्भनाल के भार में भी आठ प्रतिशत तक की कमी आ गयी। इसकी वजह ये थी कि प्लास्टिक के कण कोशिकाओं में जम गए थे जिससे खून के प्रवाह में कमी आ गयाी थाी। रक्तप्रवाह घटने से भ्रूण को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाता है और अन्य पोशक तत्व भी नहीं मिल पाते। इससे उसका विकास प्रक्रिया धीमा पड़ जाता है।

दूध की बोतल भी कम घातक नहीं – आयरलैंड में स्थित ट्रिनिटी कॉलेज के हालिया शोध ने काफी सारे चौकाने वाले खुलासे किये हैं इनके अनुसार दूध की बोतल को शिशुओं के शरीर में प्लास्टिक कणों के प्रवेश का मुख्य स्रोत साबित होता है। शोधकर्ताओं ने पाया था कि प्लास्टिक की बोतल में दूध पीने वाले बच्चे रोजाना करोड़ों टन प्लास्टिक कण निगलते हैं। जो काफी भयभीत करने वाले आंकड़े हैं।

डराते हैं ये आंकड़े- 
सामग्री : स्वाभाविक रूप से नष्ट होने की अवधि

-प्लास्टिक की थैली : 20 से 1000 साल

-प्लास्टिक की बोतल : 450 साल

-प्लास्टिक कप: 50 साल

-प्लास्टिक की परत वाले पेपर-कप : 30 साल

धरती पर अनावश्यक बोझ-

-मौजूदा समय में15 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा दुनियाभर के समुद्र में होने का अनुमान है।

-80 लाख टन प्लास्टिक कचरा हर वर्ष समुद्र में पहुंचता है, इसमें से एक-तिहाई चीन से आता है।

-10 लाख से अधिक पक्षी और 1 लाख समुद्री जीव हर साल प्लास्टिक कचरे का शिकार बनते हैं।

-अगर हम नहीं संभले तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक कचरा होने का खतरा।

भारत में भी स्थिति चिंताजनक-

-25 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में पॉलीथीन के प्रयोग पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध।

-बावजूद इसके 15 हजार टन से अधिक प्लास्टिक कचरा रोजाना शहरों में पैदा होता है ।

-09 हजार टन कचरे को ही इसमें से इकट्ठा कर प्रसंस्कृत या रिसाइकिल करने में ही सक्षम हैं।
-90% विश्व के कुल प्लास्टिक कचरे का बोझ सहने वाली 10 में से 3 नदियां भारत में ही हैं।